रायपुर। सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते हुए आपने कई बार SDM और SDO का नाम सुना ही होगा। कई बार तो लोग इन दोनों अधिकारियों को एक ही समझ लेते हैं। लेकिन हकीकत में दोनों की पावर, पोस्टिंग और जिम्मेदारियों में जमीन आसमान का फर्क होता है। अगर आप भी अक्सर इस बात को लेकर उलझन में रहते हैं कि आपका काम SDM ऑफिस में होगा या SDO के पास तो अब कन्फ्यूज होने की जरूरत नहीं है। आइए अफसरशाही के इस सवाल का जवाब जानते हैं।
एसडीएम (SDM): कानून-व्यवस्था और राजस्व का असली बॉस
SDM यानी सब डिविजनल मजिस्ट्रेट पूरे सब डिवीजन का कंट्रोलिंग अफसर होता है। इसे आप सीधे तौर पर जिले के डीएम (कलेक्टर) का छोटा रूप कह सकते हैं। एक SDM के पास क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की शक्तियां होती हैं। अगर इलाके में कोई दंगा या बवाल हो जाए तो भीड़ पर लाठीचार्ज करवाना, आंसू गैस के गोले छुड़वाना और यहां तक कि गिरफ्तारी के आदेश देना सीधे SDM के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इसके अलावा विवाह प्रमाण पत्र बनाना, ड्राइविंग और शस्त्र लाइसेंस जारी करना, जाति या निवास प्रमाण पत्र (OBC/SC/ST/Domicile) बनाने जैसे आम जनता से जुड़े सारे काम SDM दफ्तर से ही होते हैं। पूरे अनुमंडल के तहसीलदार भी सीधे SDM को ही रिपोर्ट करते हैं। इस पद पर आमतौर पर UPSC पास करने वाले नए IAS अफसर या राज्य सिविल सेवा के सीनियर अधिकारी बैठते हैं।
एसडीओ (SDO): हर सरकारी विभाग का मुख्य अधिकारी
दूसरी तरफ SDO का मतलब है सब डिविजनल ऑफिसर। यह पद किसी एक खास विभाग तक सीमित नहीं है। सरकार के लगभग हर महकमे में एक SDO होता है। चाहे वह बिजली बोर्ड हो, पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) हो, सिंचाई विभाग हो या फिर डाक विभाग। एक SDO अपने सब-डिवीजन में उस खास विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी होता है।
SDO के पास ‘भू राजस्व संहिता’ (Land Revenue Code) की पावर होती है। यह पद भूमि राजस्व न्यायालय के अधीन आता है और एक तरह से अपीलीय कोर्ट का काम करता है। SDO की भर्ती मुख्य रूप से राज्य लोक सेवा आयोग (PCS) की परीक्षाओं के जरिए होती है। कई बार निचले पदों पर बेहतरीन काम करने वाले कर्मचारियों को प्रमोट करके भी SDO बना दिया जाता है।
दोनों अफसरों के काम अलग हैं लेकिन आम जनता का वास्ता दोनों से पड़ता है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि पावर के मामले में कौन किस पर भारी पड़ता है और आपका जरूरी काम किसके अधिकार क्षेत्र में आता है।
पावर और दायरा: किसके पास है असली ताकत?
अगर सीधे शब्दों में समझें तो SDM एक एडमिनिस्ट्रेटिव और मजिस्ट्रियल पद है जिसका काम पूरे अनुमंडल (Sub-Division) की कानून व्यवस्था और राजस्व को संभालना है। जबकि SDO एक विभागीय पद है जो सिर्फ अपने विभाग (जैसे बिजली या पानी) के कामकाज को देखता है।
SDM सीधे तौर पर जनता की रोजमर्रा की कानूनी और प्रशासनिक जरूरतों से जुड़ा है। चुनाव कराने से लेकर गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन तक का जिम्मा SDM के कंधों पर होता है। वहीं SDO अपने विभागीय प्रोजेक्ट्स और स्टाफ को मैनेज करता है। इसलिए पावर और प्रभाव के नजरिए से देखें तो SDM का दायरा SDO के मुकाबले काफी बड़ा और ताकतवर होता है।
आसान भाषा में समझें तो अगर आपके इलाके में बिजली नहीं आ रही है या सड़क खराब है तो आप विभागीय SDO के पास जाएंगे। लेकिन अगर आपके इलाके में कानून व्यवस्था बिगड़ गई ह जमीन का कोई बड़ा विवाद है या आपको अपना कास्ट सर्टिफिकेट बनवाना है तो आपको SDM के दरवाजे पर दस्तक देनी होगी।
सवाल: SDM और SDO का फुल फॉर्म क्या होता है?
जवाब: SDM का फुल फॉर्म सब डिविजनल मजिस्ट्रेट होता है जबकि SDO का फुल फॉर्म सब डिविजनल ऑफिसर होता है।
सवाल: लाठीचार्ज का आदेश SDM देता है या SDO?
जवाब: लाठीचार्ज, आंसू गैस या गिरफ्तारी का आदेश देने की पावर SDM के पास होती है क्योंकि वह CrPC की शक्तियों का इस्तेमाल करता है।
सवाल: SDM बनने के लिए कौन सी परीक्षा पास करनी होती है?
जवाब: SDM बनने के लिए उम्मीदवार को UPSC सिविल सेवा (IAS) या राज्य लोक सेवा आयोग (State PCS) की परीक्षा पास करनी होती है।